अबूझमाड़ के 14 गांवों के लिए ITBP के लकड़ी के पुल बने संजीवनी

रायपुर, 01 अगस्त 2026: दशकों से विकास की मुख्यधारा से कटे और लाल आतंक के साए में जीने को मजबूर नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के 14 दूरस्थ गांवों के लिए इस बार का मानसून किसी वरदान से कम नहीं है। यहां उफनती नदियों और गहरी खाईयों के कारण बरसात के दिनों में दुनिया से पूरी तरह कट जाने वाले इन गांवों को जोड़ने के लिए 44 वीं वाहिनी आईटीबीपी (ITBP) के वीर जवानों ने लकड़ी के अस्थायी 'फुट ब्रिज' (पैदल पुल) तैयार कर ग्रामीणों के जीवन में नई उम्मीद जगाई है। यह पहल इन गांवों के लिए किसी संजीवनी से कम साबित नहीं हो रही है।
36 सालों का विकास का इंतजार और ओरछा से टूटता संपर्क
यह इलाका वर्ष 1990 के दशक से ही अत्यधिक नक्सली प्रभाव के कारण मूलभूत सुविधाओं से अछूता रहा है। सड़क और स्थायी पुल-पुलियों का निर्माण यहां एक बड़ी चुनौती बना रहा। हर साल बारिश के आते ही नदी-नालों का जलस्तर इतना बढ़ जाता था कि इन 14 गांवों का ओरछा मुख्यालय से संपर्क पूरी तरह कट जाता था। ऐसे में ग्रामीणों को स्वास्थ्य सेवाओं, राशन और अन्य दैनिक जरूरतों के लिए आवाजाही करना अपनी जान जोखिम में डालने जैसा होता था। यह समस्या पिछले 36 सालों से लगातार बनी हुई थी।
जवानों का मानवीय चेहरा: सुरक्षा के साथ सुगम यातायात
क्षेत्र में 44वीं वाहिनी आईटीबीपी द्वारा सुरक्षा कैंप स्थापित किए जाने के बाद से जवानों ने न केवल क्षेत्र में शांति और सुरक्षा का माहौल बनाया है, बल्कि स्थानीय निवासियों की वर्षों पुरानी पीड़ा को भी समझा। जवानों ने अपने अदम्य साहस और स्थानीय संसाधनों का चतुराई से उपयोग करते हुए, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर मजबूत लकड़ी के अस्थायी फुट ब्रिज का निर्माण किया है। इन अस्थायी पुलों के माध्यम से अब ग्रामीण मानसून की उफनती नदियों को पार कर, बरसात के दिनों में भी सुरक्षित रूप से ओरछा तक आ-जा सकेंगे, चाहे वह पैदल हों या अपने दोपहिया वाहनों से।
अस्थायी लकड़ी के ब्रिज ग्रामीणों के लिए लाइफलाइन
इस संदर्भ में, सेनानी, 44वीं वाहिनी आईटीबीपी के सिद्धिक पी. पी. ने कहा, "हमारी प्राथमिकता केवल इस क्षेत्र में सुरक्षा प्रदान करना ही नहीं है, बल्कि स्थानीय नागरिकों के जीवन को यथासंभव सुगम बनाना भी है। जब तक स्थायी सड़कों और पुलों का निर्माण पूरा नहीं हो जाता, तब तक ये अस्थायी लकड़ी के ब्रिज इन ग्रामीणों के लिए जीवन रेखा (लाइफलाइन) का काम करेंगे।"
ग्रामीणों ने जताया आभार
दशकों बाद बारिश के दिनों में भी सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिलने पर स्थानीय ग्रामीणों की खुशी का ठिकाना नहीं है। उन्होंने आईटीबीपी के इस मानवीय और दूरदर्शी प्रयास की खुलकर सराहना की है। ग्रामीणों का कहना है कि इन लकड़ी के पुलों ने उनकी मुश्किलों को बहुत हद तक आसान कर दिया है। अब आपातकालीन स्थिति में अस्पताल पहुंचना या आवश्यक राशन लाना उनके लिए संभव हो सका है, जो पहले असंभव सा लगता था।
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