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राष्ट्रपति भवन में गूंजी बस्तर की जनजातीय संस्कृति

सोमवार, 3 अगस्त 20260 व्यूज
राष्ट्रपति भवन में गूंजी बस्तर की जनजातीय संस्कृति
नारायणपुर के मांझी-चालकी और 'बस्तर पंडुम' के विजेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से राष्ट्रपति भवन में मुलाकात की। इस मुलाकात में बस्तर की अनूठी सामाजिक व्यवस्था और समृद्ध जनजातीय विरासत का प्रदर्शन किया गया।

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की घने जंगलों में रमी, अनूठी सामाजिक व्यवस्था और समृद्ध जनजातीय विरासत की गूंज अब देश के सर्वोच्च मंच, राष्ट्रपति भवन तक जा पहुंची है। यह गौरवपूर्ण क्षण तब आया जब नारायणपुर जिले के पारंपरिक मांझी-चालकी और ‘बस्तर पंडुम’ प्रतियोगिता के विजेताओं का एक विशेष प्रतिनिधिमंडल महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से सौजन्य भेंट करने पहुंचा। इस आत्मीय मुलाकात के दौरान, प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति को बस्तर की जीवंत परंपराओं, लोक कलाओं और सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान से विस्तार से रूबरू कराया।

यह ऐतिहासिक दौरा 30 जुलाई 2026 को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में संपन्न हुआ। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने किया। इसमें ‘बस्तर पंडुम’ प्रतियोगिता के विभिन्न विधाओं के विजेता, स्थानीय पारंपरिक स्वशासी व्यवस्था के प्रमुख मांझी-चालकी समुदाय के सदस्य, और पद्मश्री से सम्मानित प्रतिष्ठित कलाकार शामिल थे। इस मुलाकात का मुख्य उद्देश्य बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिलाना था।

इस महत्वपूर्ण यात्रा की शुरुआत 27 जुलाई 2026 को नारायणपुर से हुई, जब नगरपालिका अध्यक्ष श्री इंद्रप्रसाद बघेल ने उत्साहपूर्ण माहौल में इस दल को दिल्ली के लिए हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। पूरे जिले के लिए यह एक अत्यंत गर्व का क्षण था, जिसने बस्तर की संस्कृति के ध्वजवाहकों को राष्ट्रीय पटल पर अपनी बात रखने का अवसर प्रदान किया।

राष्ट्रपति भवन में हुई इस भेंट के दौरान, बस्तर की कला और परंपरा के प्रमुख प्रतिनिधि मौजूद रहे। ‘बस्तर पंडुम’ प्रतियोगिता में जनजातीय आभूषण विधा की विजेता मुंगड़ी कोर्राम और सुदनी दुग्गा ने अपने हाथों से बनाए पारंपरिक आभूषणों के सौंदर्य और उनके गहरे सांस्कृतिक महत्व को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया। वहीं, बस्तर की अनूठी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हुए एड़का परगना के मांझी राजाराम, करंगाल परगना के मांझी सुधवाराम करंगा, गोटाली परगना के मांझी मंगतू राम ध्रुव, नूरदेश परगना के मांझी गुड्डू पोटाई तथा करंगाल परगना के चालकी सोमारू राम ने बस्तर की पारंपरिक सामाजिक संरचना, रीति-रिवाजों और न्याय व्यवस्था का जीवंत परिचय दिया।

इस मुलाकात ने न केवल नारायणपुर और समूचे बस्तर संभाग को गौरवान्वित किया है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को एक नई पहचान और सम्मान दिलाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे उच्चस्तरीय मंचों से जनजातीय कला, परंपराओं और लोक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन को अभूतपूर्व बल मिलेगा, जो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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